उपांशुग्रह
यन्त्रोपारोपितकोशांशः
[सम्पाद्यताम्]Monier-Williams
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पृष्ठभागोऽयं यन्त्रेण केनचित् काले काले मार्जयित्वा यथास्रोतः परिवर्तयिष्यते। तेन मा भूदत्र शोधनसम्भ्रमः। सज्जनैः मूलमेव शोध्यताम्। |
उपांशुग्रह/ उपांशु--ग्रह m. the first ग्रहor ladle-full of सोमpressed out at a sacrifice TS. S3Br. etc.
Vedic Rituals Hindi
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पृष्ठभागोऽयं यन्त्रेण केनचित् काले काले मार्जयित्वा यथास्रोतः परिवर्तयिष्यते। तेन मा भूदत्र शोधनसम्भ्रमः। सज्जनैः मूलमेव शोध्यताम्। |
उपांशुग्रह पु.
सोमयाग के प्रातः सवन में सूर्योदय के पूर्व किये जाने वाले प्रथम सोम-निष्पीडन का नाम यह बिना पाठ के ही सम्पन्न किया जाता है, कुछ यजुषों को छोड़कर जो मौनावस्था में बिना साँस लिए बुदबुदाई जाती है, आप.श्रौ.सू. 12.1.7; तुल. इग्ग्लिंग, श.ब्रा.इ. XXVI. 244. एक प्याले उपस्थान उपांशुग्रह 177 के लिए पर्याप्त सोम की कुछ टहनियां ढेर में से निकाली जाती है और सवन-चर्म पर रख दी जाती है और उनके उपर होतृ-चमस में से ‘निग्राभ्य’ जल छिड़का जाता है। इसके बाद ये टहनियां उपांशु-सवन नामक पत्थर से क्रमशः 8, 11 एवं 12 प्रहार की तीन आवृत्तियों में दबायी जाती है। निस्सारित रस हस्त-विवर से सीधे प्याले या पात्र में, इसमें बिना पवित्रा रखे ही उड़ेल दिया जाता है, आप.श्रौ.सू. 12.9.1-11. यह सवन क्षुल्लकाभिषव कहा जाता है (लघुसवन); VH I49 महासवन जो इसके शीघ्र बाद आता है, से भेद बतलाने के लिए।
