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एकादशिनी

विकिशब्दकोशः तः

यन्त्रोपारोपितकोशांशः

[सम्पाद्यताम्]

पृष्ठभागोऽयं यन्त्रेण केनचित् काले काले मार्जयित्वा यथास्रोतः परिवर्तयिष्यते। तेन मा भूदत्र शोधनसम्भ्रमः। सज्जनैः मूलमेव शोध्यताम्।

एकादशिनी [ēkādaśinī], 1 Eleven repetitions of a Mantra.

A kind of sacrifice.

पृष्ठभागोऽयं यन्त्रेण केनचित् काले काले मार्जयित्वा यथास्रोतः परिवर्तयिष्यते। तेन मा भूदत्र शोधनसम्भ्रमः। सज्जनैः मूलमेव शोध्यताम्।

एकादशिनी f. the number eleven TS. S3Br. Ya1jn5.

पृष्ठभागोऽयं यन्त्रेण केनचित् काले काले मार्जयित्वा यथास्रोतः परिवर्तयिष्यते। तेन मा भूदत्र शोधनसम्भ्रमः। सज्जनैः मूलमेव शोध्यताम्।

एकादशिनी स्त्री.
(एकादश + इन् + ङीप्) 11 वध्यों वाला एक पशु याग। यह यज्ञ सोमयाग के सवनीय पशु-याग पर आधृत है और स्वयं में बहुविध पशुयागों का मानदण्ड है, श्रौ.को. (अं.) I.ii.96०. यूपों की संख्या तेरह होती है एकवृत् एकादशिनी 189 जिनमें 12वां ‘उदशय’ एवं 13वां पात्नीवत कहलाता है; केवल एक यूप से भी काम चल सकता है, का.श्रौ.सू. 8.8.27 (एकयूपे पश्वेकादशिन्यामागन्ेयं नियुज्य तस्मिंस्तस्मिंन्नितरानुदीचः); सबसे दक्षिणी यूप सबसे लम्बा होता है, का.श्रौ.सू. 8.8.19 (वर्षिष्ठो दक्षिणोऽनुपूर्वा इतरे); द्रष्टव्य-‘यथोच्छ्रितम्’ का.श्रौ.सू. 8.8.25-26. यदि ग्यारह पशुओं को एक यज्ञीय यूप में बाँधना हो, तो अगिन् के लिए समर्पित पशु को सर्वप्रथम इसमें बाँधते हैं, तब दूसरे (अर्थात् दूसरे पशु) एक शृंखला में एक के बाद एक बाँधे जाते हैं (अर्थात् उत्तर की तरफ तीसरा दूसरे के बाद, और इसे प्रकार आगे)। दक्षिण की तरफ पहले वाले का सर्वप्रथम वध किया जाता है, एवं अन्य का इसके उत्तर एवं और उत्तर, का.श्रौ.सू. 8.8.28 (दक्षिणं च निघ्नन्त्येनमुत्तर- मुत्तरमितरान्) 11 वध्य पशु हैं ः आगन्ेय, सारस्वत, सौम्य, पौष्ण, बार्हस्पत्य, वैश्वदेव, ऐन्द्र, मारुत, ऐन्द्रागन्, सावित्र एवं वारुण, श्रौ.को (सं.) II.599।

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