महाभिषव
यन्त्रोपारोपितकोशांशः
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पृष्ठभागोऽयं यन्त्रेण केनचित् काले काले मार्जयित्वा यथास्रोतः परिवर्तयिष्यते। तेन मा भूदत्र शोधनसम्भ्रमः। सज्जनैः मूलमेव शोध्यताम्। |
महाभिषव/ महा-- ( हा-भ्) m. the -grgreat distillation of सोमA1pS3r. Ka1tyS3r. Sch.
Vedic Rituals Hindi
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महाभिषव पु.
(महान् चासौ अभिषवः) आहुति के लिए प्यालों को भरने के लिए रस निकालने के लिए सोम के डण्ठलों का बड़ा निष्पीडन (दबाना)। सवन-क्रिया (दबाने की प्रक्रिया) अध्वर्यु और उसके सहायकों प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा और उन्नेता द्वारा तीन बारी के तीन चक्रों में किया जाता है और सवन-प्रस्तर के चोटों (प्रहारों) की संख्या क्षुल्लकाभिषव की तरह सीमित नहीं होती अर्थात् असीमित होती है। निष्पीडन की क्रिया सोम याग में दिन में तीन बार होती है, आप.श्रौ.सू. 12.9.7; गीली एवं जीर्ण डण्ठलों को ‘सम्भरणी’ नाम वाले पात्र में इकट्ठा किया जाता है और उसके बाद उसे ‘आधवनीय’ पात्र में स्थानन्तरित कर दिया जाता है, जिसमें पानी भरा रहता है। उसके बाद उद्गाता ऐसे ‘द्रोणकलश’ को लाता है, जिसके ऊपर एक ऊन का छनना लगा हो और द्रोणकलश को सोम-लताओं से ढके हुए चार सवन-प्रस्तरों के ऊपर रख देता है। होता का जल से युक्त चमस यजमान द्वारा पकड़ा जाता है और उन्नेता द्वारा ‘आधवनीय’ से आहृत सोम रस से (वह चमस) भर दिया जाता है। यजमान होता के चमस के लिए इसे ‘दशापवित्र’ के माध्यम से द्रोणकलश में एक सतत धारा में सोम उडे़लता है। द्रोणकलश में विद्यमान सोम ‘शुक्र’ के रूप में जाना जाता है, का.श्रौ.सू. 9.5.15. इससे विभिन्न प्यालों को आपूरित किया जाता है ः अन्तर्याम, ऐन्द्रवायव, मैत्रावरुण, शुक्रामन्थिन्, आग्रयण, उक्थ्य, आश्विन, एवं ध्रुव।
