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समिष्टयजुस्

विकिशब्दकोशः तः

यन्त्रोपारोपितकोशांशः

[सम्पाद्यताम्]

पृष्ठभागोऽयं यन्त्रेण केनचित् काले काले मार्जयित्वा यथास्रोतः परिवर्तयिष्यते। तेन मा भूदत्र शोधनसम्भ्रमः। सज्जनैः मूलमेव शोध्यताम्।

समिष्टयजुस्/ सम्-इष्ट---यजुस् n. sacrificial formula and sacrifice VS. S3Br. Ka1tyS3r.

पृष्ठभागोऽयं यन्त्रेण केनचित् काले काले मार्जयित्वा यथास्रोतः परिवर्तयिष्यते। तेन मा भूदत्र शोधनसम्भ्रमः। सज्जनैः मूलमेव शोध्यताम्।

समिष्टयजुस् न.
इष्टि की (तीन) अन्तिम आहुतियों का नाम। अध्वर्यु वेदि के भीतर खड़ा होता है और ‘देवा गातुविदो - -----यजमानं स्वाहा’ इस मन्त्र से ध्रुव (में) से घृत की प्रथम समिष्टयजुस् आहुति आहवनीय में डालता है; उसे वहीं खड़े होकर बर्हिस् (में) से कुछ दर्भपत्र लेने चाहिए एवं ‘वाचि स्वाहा’ मन्त्र से उन दर्भ-पत्रों के साथ-साथ द्वितीय आहुति देना चाहिए। ‘वाते धाः स्वाहा’ से वह तृतीय आहुति देता है, भा.श्रौ.सू. 3.7.13, 18; 4.19.2०; तुल.का.श्रौ.सू. 3.6-8; 2.2; बौ.श्रौ.सू. 1.2०-21; 3.19- 2०, 26, ‘शुनासीरीय’ के अन्त में केवल एक समिष्टयजुस् होता है, भा.श्रौ.सू. 8.23; श्रौ.को. (अं.) I.761. पशुयाग में प्रथम समिष्टयजुस् (आहुति) चम्मच से ‘यज्ञ यज्ञं गच्छ-- --’ से, द्वितीय चम्मच से ‘एष ते यज्ञो यज्ञपते-----’ इस मन्त्र के साथ एवं तृतीय करछुल से ‘देवा गातु विदो- ---’ इस मन्त्र के साथ दी जाती है, बौ.श्रौ.सू. 4.1०-11. शालिकी के अनुसार सभी तीनो (आहुतियां) करछुल से दी जाती हैं [एक बार वह ध्रुवा को भरता है, वह यज्ञीय घास से एक मुट्ठी दर्भपत्र लेता है, उसके बाद सीधे-खड़ा होकर वेदि के भीतर ध्रुवा से ‘देवा गातुविदो------’ मन्त्र के अन्त तक सतत रूप से (लगातार) समिष्टयजुस् आहुति डालता है; ‘स्वाहाकार’ के पूर्व वह मुट्ठी भर दर्भपत्रों को अगिन् में फेंक देता है; वायु देवता के लिए एक आहुति, आप.श्रौ.सू. 3.13.2; बौ.श्रौ.सू. 1.21 (दर्श)। समिष्टयजुसों की संख्या नौ है, आप.श्रौ.सू. 13.18.4 (सोम); का.श्रौ.सू. 1०.8.13; चयन में ग्यारह, आप.श्रौ.सू. 17.23.9; द्रष्टव्य - श्रौ.को. (सं.) I.239। समीक्ष्य (सम् + ईक्ष् + ल्यप्) संवाद करके (भाष्य-संवादं कृत्वा), बौ.श्रौ.सू. 8.13।

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